Poetry

तुम्हारी पसंद नापसंद

याद है तुम्हारी पसंद नापसंद अब भी,
थोड़ा तीखा कम, और मीठा ज़्यादा।

किताबें बहुत सी होंगी आस पास,
बस हिसाब किताब ही नहीं होगा लिखा।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद अब तक,
खर्चा बहुत, हिसाब कम।
लसुन थोड़ा ज्यादा, नमक बस संभाल कर।

सावन का इंतज़ार, और
झपाक खिड़की का बंद होने की आवाज़,
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद सभी,
गीले बालों को सुलझाना, उलझने बढ़ाना,
एलाइची वाली चाय, और देर तक उबाली।

देर शाम का आना, और सुबह जल्दी होना,
इत्तेफाकन नज़रे मिलना, यूँही फ़ेर लेना,
ईथर उथर की बातें होंगी, और
मुलाकातों से बचते जाना।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद की अदा,
दूर से नज़रे मिलना, पास से ही गुजर जाना,
थोड़ा तीखा कम, मीठा तेज रखना।

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Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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Poetry

कौन हैं तुझे पूछने वाला यहाँ?

कौन पूछेगा नाम महफ़िल में तेरा,
छोड़ कर जाने की अदा अभी देखी कहाँ|

उनकी हसीं हैं दर्द की,
ज़ख्म गहरा हैं उनके लबों पर|

तमाचे की आवाज़ भी आई उधर,
चोट का निशाँ भी दिखा उन पर|

ये दर्द, ज़ख्म, ख़ामोशी उन शायरों के हैं,
तेरा तो अपना यहाँ साया भी नहीं|

गुल्फ़ाम, तेरा तो दर्द दिल में ही हैं,
तेरे तो लफ्ज़ भी तेरे अपने नहीं|

कौन पूछेगा महफ़िल में तुझे,
दिल्लगी से तेरी मुलाकातअब तक हुई कहाँ|

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Poetry

बरसात की राख़

स्कूटर पर भीगे मौसम मे जो गलियाँ नाप देते थे,
बूँदों से जो गले से पीठ तक,
हरुफ़-ए -तहज़ी जोड़ शायरी पढ़ते थे तुम|

क्या वैसे ही उन्स का लुफ़्त
तुम रंजिश में अपने नए यार से भी निभाते हो?

हो जो कोई जवाब तो कहना
उसी स्कूटर पर यार के पीछे बैठ कर,
गर्म साँसों से बरसात मे भीगते हुए।

आग हैं कोई जो जलती रह गई हैं,
रफ़्ता रफ़्ता राब्ता होगा उस बरसात की राख़ से मेरा।

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Fictions

Daily Prompt: Heal

“No, you are not here to tell the truth.” Disha shouted.

Taking the support of the door, Geet was not able to look into her eyes. All she could see everything cluttered in the room.

“What can you say now? You don’t have to make up stories around the truth.” Disha said with teary eyes. “You destroyed my relationship with Rachit.”

The relationship among two sisters and a man had only one truth. Truth cannot heal relation.

via Heal

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Poetry

एकतरफ़ा

इस नींद से
नफरत भी हैं,
उतना ही
इश्क भी|

जो जगा
तो ख्यालों में तुम,
जो सोया
तो ख्वाबों में तुम|

ये एकतरफ़ा
ज़िन्दगी भी हैं,
और एक
कतल सा भी हैं|

तुम हो बस
मेरे ख्यालों के हो,
तुम न हो तो
किसी के भी नहीं|

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Poetry

मासूमियत

आज वही मासूमियत से मुलाकात हुई,
अब वो रोज़ रोज़ तो नहीं मिलती,
लेकिन माज़ी को याद
कर लेता हूँ कभी कभी।

अभी कल ही की बात हैं,
मिलते ही बोली,
“कहाँ थे इतने दिन?”
“यहाँ कैसे, अच्छा ये सब छोड़ो,
और अब कहाँ?”

कितने बदल गए ये दिन ये रात,
कितने बदल गए सब, और तुम।
हाँ तुम, मासूमियत तो वही हैं,
उस बस स्टॉप से इस शाम तक।

बे-आबरू हो कर किताबों मे,
अब नहीं मिलती
वो मोटे कागजों की कहानी,
धूल मे ढकी हुई सुस्त आँखें,
इतनी मासूम तो न थी तुम।

वहीं मिलता हूँ तुम्हें मैं,
मासूम लफ्जों मे, बे-सब्र इत्तेफाकों में,
और तुम माज़ी में ही ढूँढते रहे,
“अब कुछ कहो भी,
कहाँ थे तुम इतने दिनों तक?”

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