उतना भी अच्छा इंसान नहीं हूँ मैं,
थक कर दो घूँट हर बार जो पीता हूँ।
उनसे मिलने के लिए तड़पता हूँ मैं,
सोच कर उन्हें मुस्कान जो पहनता हूँ।
रोज़ रात एक किरदार उतारता हूँ मैं,
ख़ुद का ख़ुद से हाल जो पूछता हूँ।
कौन जानता हैं यहाँ कौन हूँ मैं,
चश्म से उनके थोड़ा जो उतरता हूँ।
इतना भी बुरा इंसान नहीं हूँ मैं,
तुम्हें देखने का बहाना जो ढूँढता हूँ।