Poetry

आओ बैठे किसी सितारें पर

पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।

देखे ज़रा दूर से,
चाँद सूरज की छुपन छुपाई।
एक आता हैं,
दूसरा कहीं दूसरे दिन मिलता हैं।

चुप भी बैठे रहेंगे हम,
और बातें भी होंगीं करने को।
अँधेरा होगा थोड़ा बहुत,
लेकिन रोशनी भी होगी सब देखने को।

आओ तो चले उस पार बैठे,
पाओं लटका कर सितारें पर।

 

“पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।”

ये दो पंक्तियाँ ट्विटर पर किसी ने share की थी, बस वहीं से आगे बढ़ाया हैं।

 

Advertisements
Standard
Fictions

अंग्रेज़ी की टीचर

10 मिनट की क्लास बाकी, फिर भी घंटों भर का भार लग रहा था। हर दिन की तरह उस दिन भी रचित को क्लास के खत्म होने का बेसब्री से इंतज़ार था।

“टन-टन-टन” बस किताब बंद की और
गालरी की ओर भाग दिया वो।

“गुड आफ्टर-नून, मिस अनीता।” हर रोज़ की तरह, उस दिन भी अंग्रेज़ी की टीचर ने रचित के बालों को सहला कर स्टाफ रूम को ओर चली गई।

पहला प्यार की तब कुछ ऐसी मुलाकात होती थी।

Standard
Fictions

अगली शाम

गाड़ी से ऊतर कर, कृशा घर को अपने चल पड़ी।

“फिर कब मिल सकते है?”

“कभी भी, जब वक़्त मिले।” उसने पलट कर आँखों से जवाब दिया, और रचित वही रुक उसे जाते देखता रहा।

खामोशी उस शाम छुट्टी पर थी। कहानी धीरे धीरे ऐसे ही बन जाती हैं।

Standard
Poetry

तुम्हारी पसंद नापसंद

याद है तुम्हारी पसंद नापसंद अब भी,
थोड़ा तीखा कम, और मीठा ज़्यादा।

किताबें बहुत सी होंगी आस पास,
बस हिसाब किताब ही नहीं होगा लिखा।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद अब तक,
खर्चा बहुत, हिसाब कम।
लसुन थोड़ा ज्यादा, नमक बस संभाल कर।

सावन का इंतज़ार, और
झपाक खिड़की का बंद होने की आवाज़,
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद सभी,
गीले बालों को सुलझाना, उलझने बढ़ाना,
एलाइची वाली चाय, और देर तक उबाली।

देर शाम का आना, और सुबह जल्दी होना,
इत्तेफाकन नज़रे मिलना, यूँही फ़ेर लेना,
ईथर उथर की बातें होंगी, और
मुलाकातों से बचते जाना।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद की अदा,
दूर से नज़रे मिलना, पास से ही गुजर जाना,
थोड़ा तीखा कम, मीठा तेज रखना।

Standard
Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

Standard
Poetry

कौन हैं तुझे पूछने वाला यहाँ?

कौन पूछेगा नाम महफ़िल में तेरा,
छोड़ कर जाने की अदा अभी देखी कहाँ|

उनकी हसीं हैं दर्द की,
ज़ख्म गहरा हैं उनके लबों पर|

तमाचे की आवाज़ भी आई उधर,
चोट का निशाँ भी दिखा उन पर|

ये दर्द, ज़ख्म, ख़ामोशी उन शायरों के हैं,
तेरा तो अपना यहाँ साया भी नहीं|

गुल्फ़ाम, तेरा तो दर्द दिल में ही हैं,
तेरे तो लफ्ज़ भी तेरे अपने नहीं|

कौन पूछेगा महफ़िल में तुझे,
दिल्लगी से तेरी मुलाकातअब तक हुई कहाँ|

Standard
Poetry

एकतरफ़ा

इस नींद से
नफरत भी हैं,
उतना ही
इश्क भी|

जो जगा
तो ख्यालों में तुम,
जो सोया
तो ख्वाबों में तुम|

ये एकतरफ़ा
ज़िन्दगी भी हैं,
और एक
कतल सा भी हैं|

तुम हो बस
मेरे ख्यालों के हो,
तुम न हो तो
किसी के भी नहीं|

Standard