Life, Poetry

एक रात का मीट

फिर इस रात हफ़्तों बाद मीट बना हैं,
अदरक प्याज़ का बेहतरीन तड़के से।

पर नहीं, मुझे नहीं खानी ये बोटी,
ऐसा नहीं के मुझे पसंद नहीं,
लेकिन प्लेट में जब माँ परोसती हैं,
लंबी अटकी परेशानियाँ याद आ जाती हैं।

बैग की टूटी हुई स्ट्रैप हैं,
बाज़ार में भीड़ भी बहुत हैं,
चार किलोमीटर के चार रुपए बचाये हैं,
और दफ़्तर का काम अलग हैं।

झुर्रियों में फैली ज़िन्दगी हैं,
फिक्र मंद हैं उनकी तबियत,
लेकिन आज फिर माँ ने मीट बनाया हैं,
नहीं, ये परेशानी के मसाले में बना
एक दिन का मीट मुझे पसंद नहीं।

Advertisements
Standard
Poetry

कौनसी नई बात हैं।

इस शाम में थकान हैं,
ये तो कोई नई बात नहीं।

गुज़रते हैं काँटों से रास्ते,
खरोंचने को यादेँ क्या खास हैं।

भीड़ में अकेले हैं,
जैसे सितारोँ में एक चाँद हैं।

तुम कहती हो तुम्हें पता हैं,
पर ये भी तो आम बात हैं।

दिल उदास हैं,
ये कौनसी नई बात हैं।

Standard
Poetry

इश्क़ की इबादत

इसे रहने दो वैसा ही,
जैसा सहर की पहली छाओं,
जैसे चाँद की जलती लौ।

इश्तेहार में चुटकी लेती
नए शहर की बेबसी,
कुचों में इमारतों से झाँकती
बादलों की महकती तस्वीरें।
इसे रहने दो ऐसा ही।

इश्क़ को ऐसा इबादत ही रहने दो,
मज़हब हुआ तो बिक जाएगा।

Standard
Poetry

उज़्र-ए-बारिश

वो जो बर्फ के ग्लेशियर होते हैं,
जो एक थपके में टूट गिरते हैं,

वैसा ही कुछ सिने में टूटा हैं,
कोई आग से नहीं पिघला कुछ।

चंद बची घड़ियों में वो गर्म- ठंडी आँहे हैं,
जैसे पिछले सब वहीं ठहरा हुआ हैं।

कोई छू कर भी देख ले असीर-ए-जिस्म,
दरून-ए-जिस्म मैं कांपता मिलता हूँ।

तुम्हें पता कैसे होगा इस सीली हवायों का,
सुना हैं,
अज़ीज़-ए-गुल्फ़ाम में उज़्र-ए-बारिश नहीं होती।

Standard
Poetry

यहाँ बिकना कितना आसाँ हैं,
कोई नफ़रत खरीद गया,
कोई मोहब्बत बेच गया।

कुछ साँसे क्या ज़हर हुई,
वो खुले में नकाब बेच गया।

साँसे

Aside
Poetry

सपना

घड़ी देख बताया उसने,
बस थोड़ा सा लेट हुआ हूँ,
चाँद को जाने वाली बस,
अभी आयी नहीं लेकिन।

हर रात का हैं ये,
सपने सच होते तो
बस न छूटती कभी।

Standard
Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

Standard