Poetry

बरसात की राख़

स्कूटर पर भीगे मौसम मे जो गलियाँ नाप देते थे,
बूँदों से जो गले से पीठ तक,
हरुफ़-ए -तहज़ी जोड़ शायरी पढ़ते थे तुम|

क्या वैसे ही उन्स का लुफ़्त
तुम रंजिश में अपने नए यार से भी निभाते हो?

हो जो कोई जवाब तो कहना
उसी स्कूटर पर यार के पीछे बैठ कर,
गर्म साँसों से बरसात मे भीगते हुए।

आग हैं कोई जो जलती रह गई हैं,
रफ़्ता रफ़्ता राब्ता होगा उस बरसात की राख़ से मेरा।

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Poetry

ये भी कोई बात हुई

चाय, सिगरेट और बारिश,
ये तो कोई बात न हुई।
तन्हाई भरी रात और तुम्हारी याद,
ये तो कोई मुलाकात न हुई।

वही गली, शहर, और घर की खिड़की,
वही पनवाड़ी, वही सिगरेट और इंतज़ार,
ये सब ठीक तो नहीं,
ये भी कोई बात हुई,
आए नहीं तुम बारिश को झाँकने खिड़की से,
मिली नहीं तुमसे फ़िर मेरी नज़रे,
ऐसे ही वापस लौट जाना होगा अपने शहर,
ये भी कोई मुलाकात हुई।

चाय, सिगरेट और बारिश,
ये तो कोई बात न हुई।

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Fragrance of Wet Hair

The fragrance under the wet hair of yours,
Could I barely leave that all alone.
Accompanied all the way with me but,
When it rained it reminded of You walking along my soul.

Shivers like those glittering stars
All above those somewhere in the darkness you hold,
Wait for the longer fleets to close all the distance,
When covered that the remains of You still walk in Me.

Hold me with what you couldn’t have,
Hardly when stairs keep falling out of the way,
The tenacious grip of you within keeps me walking,
When I dare not take step,
When it rained it reminded of you walking along my soul.

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Poetry

Across the Road

Delhi in Winters

Only a silent mind
Can hear more
Than walls do.
He heard only
Trees to romance
With the Wind
Across the Road.

When it rains
In the month of December
Nothing but fog appears.
And she could not
Find her heart
Left in his apartment
Across the road.

Oh, this city named
For the weather
Of chills and gray
Delhi, all the leaves
Crunched under
His and her footsteps
Across the road.

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पिछली बारिश

याद हैं,
पिछली बारिश में,
एक छतरी के निचे,
आधे भीगे तुम थे,
आधा भीगा मैं था,
और जैसे ही गरज कर
बादलो ने थोड़ी बिजली भड़काई,
तुमने लिपट कर
बता दिया था के
कितने भीगे हुए तुम थे|
आज वो बारिश फिर हो रही हैं|
ये बादल पर नए हैं,
ये मिटटी की महक भी नयी हैं,
ये रात भी आज नयी हैं,
फासले भी बढ़ गए हैं,
फिर क्यूँ बारिश वही हैं?
फ़िलहाल एक छाते के साथ
मैं उसी चाय की दूकान पे हूँ,
शायद तुम्हे याद हो वो भीगना|

 

 

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