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तुम्हारी पसंद नापसंद

याद है तुम्हारी पसंद नापसंद अब भी,
थोड़ा तीखा कम, और मीठा ज़्यादा।

किताबें बहुत सी होंगी आस पास,
बस हिसाब किताब ही नहीं होगा लिखा।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद अब तक,
खर्चा बहुत, हिसाब कम।
लसुन थोड़ा ज्यादा, नमक बस संभाल कर।

सावन का इंतज़ार, और
झपाक खिड़की का बंद होने की आवाज़,
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद सभी,
गीले बालों को सुलझाना, उलझने बढ़ाना,
एलाइची वाली चाय, और देर तक उबाली।

देर शाम का आना, और सुबह जल्दी होना,
इत्तेफाकन नज़रे मिलना, यूँही फ़ेर लेना,
ईथर उथर की बातें होंगी, और
मुलाकातों से बचते जाना।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद की अदा,
दूर से नज़रे मिलना, पास से ही गुजर जाना,
थोड़ा तीखा कम, मीठा तेज रखना।

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जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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कौन हैं तुझे पूछने वाला यहाँ?

कौन पूछेगा नाम महफ़िल में तेरा,
छोड़ कर जाने की अदा अभी देखी कहाँ|

उनकी हसीं हैं दर्द की,
ज़ख्म गहरा हैं उनके लबों पर|

तमाचे की आवाज़ भी आई उधर,
चोट का निशाँ भी दिखा उन पर|

ये दर्द, ज़ख्म, ख़ामोशी उन शायरों के हैं,
तेरा तो अपना यहाँ साया भी नहीं|

गुल्फ़ाम, तेरा तो दर्द दिल में ही हैं,
तेरे तो लफ्ज़ भी तेरे अपने नहीं|

कौन पूछेगा महफ़िल में तुझे,
दिल्लगी से तेरी मुलाकातअब तक हुई कहाँ|

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एकतरफ़ा

इस नींद से
नफरत भी हैं,
उतना ही
इश्क भी|

जो जगा
तो ख्यालों में तुम,
जो सोया
तो ख्वाबों में तुम|

ये एकतरफ़ा
ज़िन्दगी भी हैं,
और एक
कतल सा भी हैं|

तुम हो बस
मेरे ख्यालों के हो,
तुम न हो तो
किसी के भी नहीं|

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मासूमियत

आज वही मासूमियत से मुलाकात हुई,
अब वो रोज़ रोज़ तो नहीं मिलती,
लेकिन माज़ी को याद
कर लेता हूँ कभी कभी।

अभी कल ही की बात हैं,
मिलते ही बोली,
“कहाँ थे इतने दिन?”
“यहाँ कैसे, अच्छा ये सब छोड़ो,
और अब कहाँ?”

कितने बदल गए ये दिन ये रात,
कितने बदल गए सब, और तुम।
हाँ तुम, मासूमियत तो वही हैं,
उस बस स्टॉप से इस शाम तक।

बे-आबरू हो कर किताबों मे,
अब नहीं मिलती
वो मोटे कागजों की कहानी,
धूल मे ढकी हुई सुस्त आँखें,
इतनी मासूम तो न थी तुम।

वहीं मिलता हूँ तुम्हें मैं,
मासूम लफ्जों मे, बे-सब्र इत्तेफाकों में,
और तुम माज़ी में ही ढूँढते रहे,
“अब कुछ कहो भी,
कहाँ थे तुम इतने दिनों तक?”

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तुम आयो तो दफ्तर कभी

दफ्तर में कभी आओ तो तुम,
एक मर्ज़ बेहिसाब मिलेगा तुम्हे|

मेज़ पर फाइलों का ढेर,
ढेरों में लिखी हुई कल की तारीख़|

लाइन में लगी उम्र होगी,
उम्रों से पुराने अटके हुए दिन|

बस इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा,
तुम आओ तो कभी दफ़्तर|

सरकारी ही हैं बस, ध्यान रखना
500 का गाँधी हो एक जेब में।
एक बाबू से बेहतर होगा पीएन|

दो कप चाय भी मिलेगी,
खर्चा तुम्हारा, चर्चा दफ्तर का।
तुम आयो तो कभी मिलने।

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अभी बाकि हैं!

पिघलता सूरज हैं,
दिन अभी ढला नहीं।

इन सरसराती हवाओँ से पूछों
खेतों की रज़ा क्या हैं।

दिन अभी बाकी हैं,
अभी शाम होने को वक़्त हैं।

इन फरफराते पंखों से पूछो
उनकी रज़ा क्या हैं।

वक़्त से पहले
आखरी उड़ान बाकि हैं

हम से कोई पूछे इस दिन
अभी बाकी क्या हैं।

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