Fictions

तीन मंजिला मकान

अभी कुछ महीने ही हुए थे प्रवीण कुमार के गुज़रे, उनके तीन बेटों ने तीन मंजिला मकाँ बेचने का इश्तिहार दे दिया। अब तीनों शादीशुदा थे। तीनों भाई अब अपने अपने परिवार वाले थे और उनकी बीवियों को साथ मे रहना आसाँ नहीं लगता था।

प्रवीण ने बड़ी हसरतों से ये तीन मंजिला मकान बनवाया था। हर बार कहते थे, “मेरे तीनों बेटे एक साथ रहेंगे एक ही घर में।”

इश्तिहार देख कर एक सज्जन, रचित, ने बड़े बेटे से कॉन्टैक्ट किया। मकान पसंद आ गया और कागज़ भी तैयार हो गए। सौदा हो गया, दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर भी हो गए।

अब रचित कहता हैं सब से, “मेरे तीनों बेटे एक साथ रहेंगे एक ही घर में।”

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Poetry

याद तो होगा नहीं तुम्हें।

एक बात तो बताना भूल गया शायद,
अभी वक़्त नहीं हुआ तुम्हारे जाने का।

अरे, तुमने तो सामान भी बाँध लिया,
उस शाम हमने बात ख़त्म तो नहीं की थी।

वादा याद हैं ना तुम्हें या फिर दोहराऊं,
एक तस्वीर साथ की,
एक तोहफ़ा 5 जनवरी का,
एक डायरी मेरे तुम्हारें ज़िक्र मुलाकात की।

हाँ, तुम्हें तो याद ही नहीं होगा कुछ,
आए बड़े, सब याद रखने वाले।

तुम तो कहती थी तुम न जाओगे ऐसे,
उस रात फिर क्या हुआ?
जाओ मैं नहीं करता बात अब तुमसे।
अब जाओ भी, और सुनों
ये यादें तो ले जाओ अपने साथ।

बात तो बताना भूल गया, शीतल,
आदतें नहीं भूल सकता तुम्हारे जाने के बाद।

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Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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Fictions

पनिशमेंट

बठिंडा से 8 बजे की इनर्सिटी जैसे ही दिल्ली के लिए चलने लगी, पाँच साल की कनिका खुशी से अपनी माँ को बताने लगी।

अभी स्टेशन से कुछ दूर ही गई थी ट्रेन, उसने पूछा, “माँ, डैडी कहाँ हैं? माँ! डैडी?”

“वो चले गए ऑफिस। उनको पनिशमेंट मिली हैं न।” गीत ने जवाब दिया। दो दिन पहले, जो मेजर रचित सरहद पर शहीद हुए, वो सजा ही थी उनके परिवार के लिए।

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टिफ़िन

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एक दिन जब कपड़े धोने के लिए उनकी तीसरी शर्ट की महक ली, तो उसकी खुश्बू अलग थी। उनके रोज़ वाला पर्फ्यूम नहीं था।

वो शाम को देर से आए। बहुत सोचा, लेकिन मैं पूछ न पाई कुछ।

अगली सुबह वो तैयार हुए ऑफिस को जाने को, मैंने भी डिब्बे मे सब्ज़ी की जगह एक चमच वजह डाल दिया।

“आज मैं टिफ़िन नहीं लेके जाऊँगा।” उन्होंने जवाब दिया। “सब्जी की महक सभी को मेरे टेबल पर खिंच ले आती हैं, और मेरे खाने को कुछ नहीं बचता|”

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