Life, Poetry

एक रात का मीट

फिर इस रात हफ़्तों बाद मीट बना हैं,
अदरक प्याज़ का बेहतरीन तड़के से।

पर नहीं, मुझे नहीं खानी ये बोटी,
ऐसा नहीं के मुझे पसंद नहीं,
लेकिन प्लेट में जब माँ परोसती हैं,
लंबी अटकी परेशानियाँ याद आ जाती हैं।

बैग की टूटी हुई स्ट्रैप हैं,
बाज़ार में भीड़ भी बहुत हैं,
चार किलोमीटर के चार रुपए बचाये हैं,
और दफ़्तर का काम अलग हैं।

झुर्रियों में फैली ज़िन्दगी हैं,
फिक्र मंद हैं उनकी तबियत,
लेकिन आज फिर माँ ने मीट बनाया हैं,
नहीं, ये परेशानी के मसाले में बना
एक दिन का मीट मुझे पसंद नहीं।

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Poetry

सुनने वाला कौन हैं यहाँ

कभी लगता हैं
तुम्हें अभी बहुत कुछ कहना हैं,
लेकिन वो सुनने वाला अब यहाँ हैं नहीं।

और अजीब हैं ये,
बातें भी उसके इर्द-गिर्द की हैं,पर
वो सुनने वाला अब यहाँ हैं नहीं।

हाँ, मैं तुम्हारे जाने के बाद,
हर्फ़-दर-हर्फ़ जज़्बात का मोहताज़ हो गया हूँ,
लेकिन तुम सुनने वाली यहाँ हो नहीं।

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Fictions

तीन मंजिला मकान

अभी कुछ महीने ही हुए थे प्रवीण कुमार के गुज़रे, उनके तीन बेटों ने तीन मंजिला मकाँ बेचने का इश्तिहार दे दिया। अब तीनों शादीशुदा थे। तीनों भाई अब अपने अपने परिवार वाले थे और उनकी बीवियों को साथ मे रहना आसाँ नहीं लगता था।

प्रवीण ने बड़ी हसरतों से ये तीन मंजिला मकान बनवाया था। हर बार कहते थे, “मेरे तीनों बेटे एक साथ रहेंगे एक ही घर में।”

इश्तिहार देख कर एक सज्जन, रचित, ने बड़े बेटे से कॉन्टैक्ट किया। मकान पसंद आ गया और कागज़ भी तैयार हो गए। सौदा हो गया, दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर भी हो गए।

अब रचित कहता हैं सब से, “मेरे तीनों बेटे एक साथ रहेंगे एक ही घर में।”

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Poetry

कौनसी नई बात हैं।

इस शाम में थकान हैं,
ये तो कोई नई बात नहीं।

गुज़रते हैं काँटों से रास्ते,
खरोंचने को यादेँ क्या खास हैं।

भीड़ में अकेले हैं,
जैसे सितारोँ में एक चाँद हैं।

तुम कहती हो तुम्हें पता हैं,
पर ये भी तो आम बात हैं।

दिल उदास हैं,
ये कौनसी नई बात हैं।

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Fictions

Phone Call

“Tring Tring…” This was 9th time Rachit called her.

She told him that he could contact her anytime. Furiously, he didn’t bother to call her again.

“Silent Cardiac Arrest” he read on her friend’s facebook status.

Seven days later, he still thought she would pick up his call, and surprise him.

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Fictions

शोर

“अगर चुप ही बैठना हैं तो शोर में क्यों न बैठ जाए?”

“मैं बातों से जेबें भर लाऊंगा अगली बार।” क्लब के ढिंचाक में रचित पास आया, “और फिर ख़ामोशी भी तो थोड़ा बात कर लेगी।”

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Poetry

यहाँ बिकना कितना आसाँ हैं,
कोई नफ़रत खरीद गया,
कोई मोहब्बत बेच गया।

कुछ साँसे क्या ज़हर हुई,
वो खुले में नकाब बेच गया।

साँसे

Aside