Poetry

यहाँ बिकना कितना आसाँ हैं,
कोई नफ़रत खरीद गया,
कोई मोहब्बत बेच गया।

कुछ साँसे क्या ज़हर हुई,
वो खुले में नकाब बेच गया।

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साँसे

Aside
Poetry

मोड़

वो मोड़ याद होगा तुम्हें,
वही जहाँ रात भर
नींद यूँही बैठी रहती थी
और तुम और मैं
बस अर्सा बाते
करते रहते थे।

हाँ वही,
आज उसी अँधेरे से
मेरा रास्ता मुड़ रहा हैं।

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Poetry

एकतरफ़ा

इस नींद से
नफरत भी हैं,
उतना ही
इश्क भी|

जो जगा
तो ख्यालों में तुम,
जो सोया
तो ख्वाबों में तुम|

ये एकतरफ़ा
ज़िन्दगी भी हैं,
और एक
कतल सा भी हैं|

तुम हो बस
मेरे ख्यालों के हो,
तुम न हो तो
किसी के भी नहीं|

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Fictions

पनिशमेंट

बठिंडा से 8 बजे की इनर्सिटी जैसे ही दिल्ली के लिए चलने लगी, पाँच साल की कनिका खुशी से अपनी माँ को बताने लगी।

अभी स्टेशन से कुछ दूर ही गई थी ट्रेन, उसने पूछा, “माँ, डैडी कहाँ हैं? माँ! डैडी?”

“वो चले गए ऑफिस। उनको पनिशमेंट मिली हैं न।” गीत ने जवाब दिया। दो दिन पहले, जो मेजर रचित सरहद पर शहीद हुए, वो सजा ही थी उनके परिवार के लिए।

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Poetry

थोड़ा थोड़ा

थोड़ी रात तुम ले आना,
मैं एक चाँद पूरा ले आऊँगा|

थोड़ी सी बातें ले आना तुम,
मैं बस्ता भर रातें ले आऊँगा|

कुछ लव्ज़ दे जाना तुम,
मैं उम्रभर तुम्हें लिखता रहूँगा|

एक पुराना किस्सा ले आना तुम,
मैं अपनी हस्ती मिटा आऊँगा|

थोड़ी याद तुम ले आना,
मैं कुछ आँसूं बहा आऊँगा|

ये थोड़ा थोड़ा कटोरी भर ज़िंदगी,
ये कुछ कुछ पल की रातें|

एक किस्सा, कई रातें,
एक रात, कई किस्से|
आते जाते, कभी थोड़ा तुम,
कभी थोड़ा मैं दे जाऊँगा|

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Fictions

नई मुलाकात

भीड़ पर बस इतना ध्यान दिया उस दिन मैंने के हर किसी के पास वक़्त हैं कहीं जाने का। रिधिका की बाते ख़त्म हो जाती अगर मैंने शायद कुछ नहीं कहा होता। पता नहीं बस स्टैंड पर उसे सिर्फ मिलने ही आया था या फिर उसे रोकने।

“रचित, तू झूठा हैं।” अचानक से ये कह कर कदम रुकवा दिए मेरे। चोंक कर उसकी ओर देखा, और आते जाते हर मुसाफिर की तरह सभी सच झूठ का हिसाब करने लगा।

“तूने कहा था तू चुप रहता हैं, लेकिन तू तो बहुत बोलता हैं|” उसने हँस कर सारे हिसाब की उलझन खोल दी।

“ये सवाल तो मुझे भी आज दोपहर से तंग कर रहा हैं।” कहना तो चाहता था के उसकी बातों में वो खुशबू हैं जो मुझे अब ज़ुबान दे रही हैं। लेकिन फिर बातों में खो कर, बात खो गयी।

जब 11 बजे की बस चंडीगढ़ की 3:50 बजे लेने का वक़्त हुआ, तो ध्यान आया मैं रिधिका को छोड़ने आया था। शायद वो भी जाना नहीं चाहती थीं। तभी तो टिकट काउंटर पर हर बार उसने नया बहाना बनाया रुकने का। नासमझ था मैं जो इशारों की बातें ना समझा।

“तुझे नहीं लगता अब तुझे जाना चाहिए?”

“अच्छा, चल बाय।” सामान उठा कर वो चल ही पड़ी थी। “सुनो, अगली बार वक़्त निकाल कर आना।” काश के वक़्त ही ना गुज़रे, और हम दोनों वही बैठे रहते।

फ़ोन से मुलाकात तक, पहली बार का सफ़र ज़िन्दगी के उस बेहतरीन पल का होता हैं जब ज़िन्दगी तो गुज़र जाती हैं, लेकिन किताबों में पुराने फूलों की खुशबू बन कर रह जाता हैं।

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Poetry

तुम्हारे इर्द गिर्द

ये हवा कितनी खुशनसीब हैं
जो तुम्हारे बालों से गुज़र रही हैं
किसी जफ़्रांवाले के उँगलियों की तरह।
जिस्म के हर कण को छू रही हैं।
काश के मैं इर्द गिर्द की हवा होता,
तुमसे दूर भी ना होता,
तुम्हारी साँसों में होता।

ये ख्याल भी तुम्हारे
जो तुमसे तन्हाई का मौका मिलते ही
शायरों सी ख्याली बातें बुन रहे हैं।
रूह को हर काफ़िले से दूर कर रहे हैं।
काश के मैं तुम्हारा ख्याल होता,
तुमसे ही बातें करता,
तुम्हारा ही ख्यालों के बारे में।

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