Life, Poetry

एक रात का मीट

फिर इस रात हफ़्तों बाद मीट बना हैं,
अदरक प्याज़ का बेहतरीन तड़के से।

पर नहीं, मुझे नहीं खानी ये बोटी,
ऐसा नहीं के मुझे पसंद नहीं,
लेकिन प्लेट में जब माँ परोसती हैं,
लंबी अटकी परेशानियाँ याद आ जाती हैं।

बैग की टूटी हुई स्ट्रैप हैं,
बाज़ार में भीड़ भी बहुत हैं,
चार किलोमीटर के चार रुपए बचाये हैं,
और दफ़्तर का काम अलग हैं।

झुर्रियों में फैली ज़िन्दगी हैं,
फिक्र मंद हैं उनकी तबियत,
लेकिन आज फिर माँ ने मीट बनाया हैं,
नहीं, ये परेशानी के मसाले में बना
एक दिन का मीट मुझे पसंद नहीं।

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Poetry

याद तो होगा नहीं तुम्हें।

एक बात तो बताना भूल गया शायद,
अभी वक़्त नहीं हुआ तुम्हारे जाने का।

अरे, तुमने तो सामान भी बाँध लिया,
उस शाम हमने बात ख़त्म तो नहीं की थी।

वादा याद हैं ना तुम्हें या फिर दोहराऊं,
एक तस्वीर साथ की,
एक तोहफ़ा 5 जनवरी का,
एक डायरी मेरे तुम्हारें ज़िक्र मुलाकात की।

हाँ, तुम्हें तो याद ही नहीं होगा कुछ,
आए बड़े, सब याद रखने वाले।

तुम तो कहती थी तुम न जाओगे ऐसे,
उस रात फिर क्या हुआ?
जाओ मैं नहीं करता बात अब तुमसे।
अब जाओ भी, और सुनों
ये यादें तो ले जाओ अपने साथ।

बात तो बताना भूल गया, शीतल,
आदतें नहीं भूल सकता तुम्हारे जाने के बाद।

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Poetry

बिग बैंग

कभी यूँ हुआ हो,
कागज़ों पर छाप देते देते
तुम्हें ख़्याल आये
ये सब मिट जाएगा।

सहर होते ही
ये अँधेरा बिखर जाएगा,
और दूर तारों से
एक बिंदु में सब मिल जाएगा।

वहाँ एक नया दौर हैं,
ज़िन्दगी अलग हैं
ख़्वाब अलग हैं,
इस जहां से अलग जहां और भी हैं।

ख़्याल से लड़ते लड़ते,
ये ज़िन्दगी भी ख़त्म होगी,
लेकिन तुम ये नहीं सोचोंगे,
क्योंकि देखा नहीं ये “बिग बैंग”।

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Poetry

ग़लतफ़हमी

तुम्हें किसने बताया,
अब गुल्फ़ाम ज़िंदा नहीं हैं?

सिने में दर्द हैं,
टूटे दिल को तुमने मौत समझ लिया।

शायर ही बना हूँ,
और मेहख़ाने में अक्सर मिलता हूँ।

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Poetry

यहाँ बिकना कितना आसाँ हैं,
कोई नफ़रत खरीद गया,
कोई मोहब्बत बेच गया।

कुछ साँसे क्या ज़हर हुई,
वो खुले में नकाब बेच गया।

साँसे

Aside
Poetry

सपना

घड़ी देख बताया उसने,
बस थोड़ा सा लेट हुआ हूँ,
चाँद को जाने वाली बस,
अभी आयी नहीं लेकिन।

हर रात का हैं ये,
सपने सच होते तो
बस न छूटती कभी।

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Poetry

आओ बैठे किसी सितारें पर

पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।

देखे ज़रा दूर से,
चाँद सूरज की छुपन छुपाई।
एक आता हैं,
दूसरा कहीं दूसरे दिन मिलता हैं।

चुप भी बैठे रहेंगे हम,
और बातें भी होंगीं करने को।
अँधेरा होगा थोड़ा बहुत,
लेकिन रोशनी भी होगी सब देखने को।

आओ तो चले उस पार बैठे,
पाओं लटका कर सितारें पर।

“पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।”

ये दो पंक्तियाँ ट्विटर पर किसी ने share की थी, बस वहीं से आगे बढ़ाया हैं।

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