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बिग बैंग

कभी यूँ हुआ हो,
कागज़ों पर छाप देते देते
तुम्हें ख़्याल आये
ये सब मिट जाएगा।

सहर होते ही
ये अँधेरा बिखर जाएगा,
और दूर तारों से
एक बिंदु में सब मिल जाएगा।

वहाँ एक नया दौर हैं,
ज़िन्दगी अलग हैं
ख़्वाब अलग हैं,
इस जहां से अलग जहां और भी हैं।

ख़्याल से लड़ते लड़ते,
ये ज़िन्दगी भी ख़त्म होगी,
लेकिन तुम ये नहीं सोचोंगे,
क्योंकि देखा नहीं ये “बिग बैंग”।

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ग़लतफ़हमी

तुम्हें किसने बताया,
अब गुल्फ़ाम ज़िंदा नहीं हैं?

सिने में दर्द हैं,
टूटे दिल को तुमने मौत समझ लिया।

शायर ही बना हूँ,
और मेहख़ाने में अक्सर मिलता हूँ।

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यहाँ बिकना कितना आसाँ हैं,
कोई नफ़रत खरीद गया,
कोई मोहब्बत बेच गया।

कुछ साँसे क्या ज़हर हुई,
वो खुले में नकाब बेच गया।

साँसे

Aside
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सपना

घड़ी देख बताया उसने,
बस थोड़ा सा लेट हुआ हूँ,
चाँद को जाने वाली बस,
अभी आयी नहीं लेकिन।

हर रात का हैं ये,
सपने सच होते तो
बस न छूटती कभी।

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आओ बैठे किसी सितारें पर

पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।

देखे ज़रा दूर से,
चाँद सूरज की छुपन छुपाई।
एक आता हैं,
दूसरा कहीं दूसरे दिन मिलता हैं।

चुप भी बैठे रहेंगे हम,
और बातें भी होंगीं करने को।
अँधेरा होगा थोड़ा बहुत,
लेकिन रोशनी भी होगी सब देखने को।

आओ तो चले उस पार बैठे,
पाओं लटका कर सितारें पर।

“पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।”

ये दो पंक्तियाँ ट्विटर पर किसी ने share की थी, बस वहीं से आगे बढ़ाया हैं।

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जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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कौन हैं तुझे पूछने वाला यहाँ?

कौन पूछेगा नाम महफ़िल में तेरा,
छोड़ कर जाने की अदा अभी देखी कहाँ|

उनकी हसीं हैं दर्द की,
ज़ख्म गहरा हैं उनके लबों पर|

तमाचे की आवाज़ भी आई उधर,
चोट का निशाँ भी दिखा उन पर|

ये दर्द, ज़ख्म, ख़ामोशी उन शायरों के हैं,
तेरा तो अपना यहाँ साया भी नहीं|

गुल्फ़ाम, तेरा तो दर्द दिल में ही हैं,
तेरे तो लफ्ज़ भी तेरे अपने नहीं|

कौन पूछेगा महफ़िल में तुझे,
दिल्लगी से तेरी मुलाकातअब तक हुई कहाँ|

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