Poetry

मोड़

वो मोड़ याद होगा तुम्हें,
वही जहाँ रात भर
नींद यूँही बैठी रहती थी
और तुम और मैं
बस अर्सा बाते
करते रहते थे।

हाँ वही,
आज उसी अँधेरे से
मेरा रास्ता मुड़ रहा हैं।

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Poetry

आओ बैठे किसी सितारें पर

पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।

देखे ज़रा दूर से,
चाँद सूरज की छुपन छुपाई।
एक आता हैं,
दूसरा कहीं दूसरे दिन मिलता हैं।

चुप भी बैठे रहेंगे हम,
और बातें भी होंगीं करने को।
अँधेरा होगा थोड़ा बहुत,
लेकिन रोशनी भी होगी सब देखने को।

आओ तो चले उस पार बैठे,
पाओं लटका कर सितारें पर।

 

“पाओं लटका कर दुनिया की तरफ़,
आओ बैठे किसी सितारें पर।”

ये दो पंक्तियाँ ट्विटर पर किसी ने share की थी, बस वहीं से आगे बढ़ाया हैं।

 

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Fictions

अगली शाम

गाड़ी से ऊतर कर, कृशा घर को अपने चल पड़ी।

“फिर कब मिल सकते है?”

“कभी भी, जब वक़्त मिले।” उसने पलट कर आँखों से जवाब दिया, और रचित वही रुक उसे जाते देखता रहा।

खामोशी उस शाम छुट्टी पर थी। कहानी धीरे धीरे ऐसे ही बन जाती हैं।

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Fictions

Arranged

“Two cold frappes please.” He placed the order, and then back to his seat.

She looked around, he scrolled down.

“So, how does it start?” She asked.

“I don’t know, I am as novice as you are.”

First arranged meeting at Barista couldn’t get enough coy.

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Poetry

तुम्हारी पसंद नापसंद

याद है तुम्हारी पसंद नापसंद अब भी,
थोड़ा तीखा कम, और मीठा ज़्यादा।

किताबें बहुत सी होंगी आस पास,
बस हिसाब किताब ही नहीं होगा लिखा।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद अब तक,
खर्चा बहुत, हिसाब कम।
लसुन थोड़ा ज्यादा, नमक बस संभाल कर।

सावन का इंतज़ार, और
झपाक खिड़की का बंद होने की आवाज़,
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद सभी,
गीले बालों को सुलझाना, उलझने बढ़ाना,
एलाइची वाली चाय, और देर तक उबाली।

देर शाम का आना, और सुबह जल्दी होना,
इत्तेफाकन नज़रे मिलना, यूँही फ़ेर लेना,
ईथर उथर की बातें होंगी, और
मुलाकातों से बचते जाना।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद की अदा,
दूर से नज़रे मिलना, पास से ही गुजर जाना,
थोड़ा तीखा कम, मीठा तेज रखना।

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Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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Poetry

बरसात की राख़

स्कूटर पर भीगे मौसम मे जो गलियाँ नाप देते थे,
बूँदों से जो गले से पीठ तक,
हरुफ़-ए -तहज़ी जोड़ शायरी पढ़ते थे तुम|

क्या वैसे ही उन्स का लुफ़्त
तुम रंजिश में अपने नए यार से भी निभाते हो?

हो जो कोई जवाब तो कहना
उसी स्कूटर पर यार के पीछे बैठ कर,
गर्म साँसों से बरसात मे भीगते हुए।

आग हैं कोई जो जलती रह गई हैं,
रफ़्ता रफ़्ता राब्ता होगा उस बरसात की राख़ से मेरा।

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