Poetry

तुम्हारी पसंद नापसंद

याद है तुम्हारी पसंद नापसंद अब भी,
थोड़ा तीखा कम, और मीठा ज़्यादा।

किताबें बहुत सी होंगी आस पास,
बस हिसाब किताब ही नहीं होगा लिखा।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद अब तक,
खर्चा बहुत, हिसाब कम।
लसुन थोड़ा ज्यादा, नमक बस संभाल कर।

सावन का इंतज़ार, और
झपाक खिड़की का बंद होने की आवाज़,
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद सभी,
गीले बालों को सुलझाना, उलझने बढ़ाना,
एलाइची वाली चाय, और देर तक उबाली।

देर शाम का आना, और सुबह जल्दी होना,
इत्तेफाकन नज़रे मिलना, यूँही फ़ेर लेना,
ईथर उथर की बातें होंगी, और
मुलाकातों से बचते जाना।
याद हैं तुम्हारी पसंद नापसंद की अदा,
दूर से नज़रे मिलना, पास से ही गुजर जाना,
थोड़ा तीखा कम, मीठा तेज रखना।

Standard
Poetry

ज़रा ज़रा सी तुम

निग़ाहें तुम्हारी कभी ख़ामोश तो नहीं थी,
पर पसंद थी बहुत मुझे।
और ज़रा ज़रा सी तुम भी।

लबों की हसीं वो हँसी तुम्हारी,
पर गार पसंद थे बहुत मुझे।
और ज़रा ज़रा सी तुम भी।

नज़दीकियां कभी उतनी हुई तो नहीं  थी,
पर बदन की ख़ुश्बू पसंद थी मुझे।
और ज़रा ज़रा सी तुम भी।

ज़रा ज़रा सा वो वक़्त,
और ज़रा ज़रा सी तुम भी,,
आज भी बहुत पसंद हो मुझे।

Standard