Fictions

सिगरेट

बहुत देर तक जब उनकी चुप्पी और मेरी खामोशी बातें कर के थक जाते, तो कबीर चले जाने का इशारा कर देते थे। मैंने कभी रोका नहीं उन्हें। अपना सामान उठाते और बस चले जाते कबीर। ऐशट्रे और उसमे रखी उनकी आधी फूँकी हुई सिगरेटे संभाल लेती थी।

जब भी कोई पूछता ये सिगरेट की आदत कहाँ से लगी, मैं उनकी यादों में फूँकी उनकी आधी रखी सिगरेट गिना देती थी।

सिगरेट को जब मैं अपने लबों पर रखती थी, एक उनके साथ होने का एहसास पा लेती थी। उठते धुएं में उनकी ख़ुशबू रहती थी| अब बस आदतें ही बाकि हैं|

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Fictions

लेट हो जाऊंगा

टिक टिक टिक… घड़ी जब रात के अँधेरे में बात कर रही थी, रचित का टेक्स्ट आया मोबाइल पर।

“मैं लेट हो जाऊंगा। तुम सो जाओ।”

अभी इंतज़ार से थक कर सोने ही लगी थी के दरवाज़े पर दस्तक हुई। पाऊ अपनी ही आहत से डर रहे थे, और जैसे सारा शहर मुझे ही सुनाई दे रहा हो। दरवाज़े से झाँका तो, रचित खड़ा था। फिर उसने अपने ही फ़ोन से कॉल किया, ये अजीब लगा।

“हेल्लो, आप रचित गुप्ता के घर से बोल रही हैं। अभी कुछ देर पहले रिंग रोड पर बाइक का एक्सीडेंट हुआ हैं, आप आ कर यहाँ रचित की बॉडी की शनास्त कर लीजिए।” दूसरी ओर से इंस्पेक्टर ने कहा।

रचित ने वादा भी निभाया आने का, और मैं पूछ भी न सकी उसके सर पर चोट कैसे लगी।

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Poetry

तुम आयो तो दफ्तर कभी

दफ्तर में कभी आओ तो तुम,
एक मर्ज़ बेहिसाब मिलेगा तुम्हे|

मेज़ पर फाइलों का ढेर,
ढेरों में लिखी हुई कल की तारीख़|

लाइन में लगी उम्र होगी,
उम्रों से पुराने अटके हुए दिन|

बस इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा,
तुम आओ तो कभी दफ़्तर|

सरकारी ही हैं बस, ध्यान रखना
500 का गाँधी हो एक जेब में।
एक बाबू से बेहतर होगा पीएन|

दो कप चाय भी मिलेगी,
खर्चा तुम्हारा, चर्चा दफ्तर का।
तुम आयो तो कभी मिलने।

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Poetry

अभी बाकि हैं!

पिघलता सूरज हैं,
दिन अभी ढला नहीं।

इन सरसराती हवाओँ से पूछों
खेतों की रज़ा क्या हैं।

दिन अभी बाकी हैं,
अभी शाम होने को वक़्त हैं।

इन फरफराते पंखों से पूछो
उनकी रज़ा क्या हैं।

वक़्त से पहले
आखरी उड़ान बाकि हैं

हम से कोई पूछे इस दिन
अभी बाकी क्या हैं।

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Poetry

फुर्सत मिले तो

इश्क़ को फुर्सत मिले तो कहना,
रंजिशें रखनी हैं तन्हाई से कभी।

चुप्पी की सलाह माने उस वक़्त,
या दो टूक हो जाये आवाज़ों से कभी।

कौन रुकता हैं ढंग के बात के बिना,
जो चले तो साथ मुकाम तक चले कभी।

फुर्सत मिले इश्क़ से तो चुप न रहना,
तन्हाई से दोस्ती का वादा है अभी।

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Poetry

शहर ही तो हैं !

शहर ही तो हैं,
दो गाड़ियाँ ज्यादा,
दो घर ज्यादा,
दो गलियाँ ज्यादा,
बस पड़ोसी कम।

शहर ही तो हैं,
दो नाम ज्यादा,
कुछ लोग ज्यादा,
दो मोबाईल ज्यादा,
बस रिश्ते कम।

इस शहर मे और हैं भी क्या,
रफ़्तार हैं तेज,
दफ़्तर मे काम ज्यादा,
थोड़ा इंतज़ार कम,
और वक़्त कम।

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Poetry

कहाँ रहते हो बिजी आज कल?

थोड़ा दफ्तर के कागजों मे,
थोड़ा सुस्त लम्हों के दिन में|

थोड़ा फोन पर बातें,
थोड़ी चलते फिरते थकावट|

थोड़ी “सरकारी बाबू” की फटकार,
थोड़ी “डिअर बेबी” थी नाराज़।

थोड़ा था मैं दफ्तर मे व्यस्त,
थोड़ा था तुम्हारी यादों मे मशरुफ़।

जब वो पूछते हैं,
कहाँ रहते हो बिजी आज कल?

थोड़ा थोड़ा हर-एक का हिस्सा,
थोड़ा थोड़ा नया किस्सा।

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