Poetry

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मेरी आँखों पर एक मोटा चश्मा होगा,
चलने को किसी का सहारा लेना होगा,
तू वहीँ कहीं मुस्कुरा रही होगी,
तब तेरी हँसी के सहारे सवेरा जागेगा,
शाम की पलके निचे तुझसे होंगी|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं झुर्रिओं में ज़िन्दगी को याद करूँगा,
गले को गर्म रखने की दावा लूँगा,
पर तू वहीँ कहीं बैठी होगी,
यादों को खुबसूरत तूने जो बनाया होगा,
तुझे उसका धन्यवाद भी तो करना होगा|

जब तेरी मेरी उम्र हो जाएगी,
मैं तुझे खुद में जिंदा रखूँगा,
मैं तेरे सहारे उम्र सारी काट लूँगा,
पर तू कहीं खुदा के पास होगी,
तेरा मुझे वहीँ से डांटना होगा,
पर मैं खुदा से तेरी खातिर नाराज़ रहूँगा|

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Fictions

Reader

37aa64015f6e7336d6c50d80d0b1c368“Do you miss me?”

“Don’t you read my poetry?”

“I lost my reader.”

It took two years for Rachit and Geet to realize the gravity. The gravity of divorce they were calculating. It was 143rd page, when she found her reference.

“With black hair with few golden strands, pierced ears at four different places, reddish and dimpled cheeks, Geet was learning to drive.” She read.

“Is that all you noticed?” She asked him.

“Is that all you read?”

Another book was about to finish, when Rachit wrote another story around her.

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Fictions

नई मुलाकात

भीड़ पर बस इतना ध्यान दिया उस दिन मैंने के हर किसी के पास वक़्त हैं कहीं जाने का। रिधिका की बाते ख़त्म हो जाती अगर मैंने शायद कुछ नहीं कहा होता। पता नहीं बस स्टैंड पर उसे सिर्फ मिलने ही आया था या फिर उसे रोकने।

“रचित, तू झूठा हैं।” अचानक से ये कह कर कदम रुकवा दिए मेरे। चोंक कर उसकी ओर देखा, और आते जाते हर मुसाफिर की तरह सभी सच झूठ का हिसाब करने लगा।

“तूने कहा था तू चुप रहता हैं, लेकिन तू तो बहुत बोलता हैं|” उसने हँस कर सारे हिसाब की उलझन खोल दी।

“ये सवाल तो मुझे भी आज दोपहर से तंग कर रहा हैं।” कहना तो चाहता था के उसकी बातों में वो खुशबू हैं जो मुझे अब ज़ुबान दे रही हैं। लेकिन फिर बातों में खो कर, बात खो गयी।

जब 11 बजे की बस चंडीगढ़ की 3:50 बजे लेने का वक़्त हुआ, तो ध्यान आया मैं रिधिका को छोड़ने आया था। शायद वो भी जाना नहीं चाहती थीं। तभी तो टिकट काउंटर पर हर बार उसने नया बहाना बनाया रुकने का। नासमझ था मैं जो इशारों की बातें ना समझा।

“तुझे नहीं लगता अब तुझे जाना चाहिए?”

“अच्छा, चल बाय।” सामान उठा कर वो चल ही पड़ी थी। “सुनो, अगली बार वक़्त निकाल कर आना।” काश के वक़्त ही ना गुज़रे, और हम दोनों वही बैठे रहते।

फ़ोन से मुलाकात तक, पहली बार का सफ़र ज़िन्दगी के उस बेहतरीन पल का होता हैं जब ज़िन्दगी तो गुज़र जाती हैं, लेकिन किताबों में पुराने फूलों की खुशबू बन कर रह जाता हैं।

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Fictions

Distraction

“Look what I do when I read” she showed him few pages of her notebook. The notebook had pages that were written on, scratched later on. Pages were hiding something. But he smiled because he read what she hid.

“You have been a constant distraction of my studies.” She continued.

“So, none other could read, except the one you named your distraction.” He replied.

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Poetry

Wrapped in Words

Right under the Shades
of the Full Moon,
All Your Naked Soul shined
I wrapped You in Words.
Dare this Moon shone
through You, I make sure
You’re concealed under Me.
Right under this Full Moon,
hold on to the Dermis of Our Soul.

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Fictions

“Would you mind if you could stay with me for a while?” He said.

She looked at him, and smiled.
She held his hand, and asked him,

“Would you mind if you could walk with me for another life?”

Another Life Walk

Aside
Poetry

Achiever of Ends.

In so green saree
She walks ahead of
many who dared
to stop her to reach out top.

Nah, she didn’t jump,
but passed by them.
Held her wrist to pull back,
to decree a substantial growth.

Achiever,  she wasn’t yet
only free from the glaring
that mattered to her waist
so smooth skin she got there.

Those who stayed behind her
realise the beauty she carried
under the wrinkles
of ageless freedom and stand alone.

Over the shoulder undressed
power she still posses
her turn with the smile
and eyes of foundless-ness
A finish comes to an End.

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