Poetry

बरसात की राख़

स्कूटर पर भीगे मौसम मे जो गलियाँ नाप देते थे,
बूँदों से जो गले से पीठ तक,
हरुफ़-ए -तहज़ी जोड़ शायरी पढ़ते थे तुम|

क्या वैसे ही उन्स का लुफ़्त
तुम रंजिश में अपने नए यार से भी निभाते हो?

हो जो कोई जवाब तो कहना
उसी स्कूटर पर यार के पीछे बैठ कर,
गर्म साँसों से बरसात मे भीगते हुए।

आग हैं कोई जो जलती रह गई हैं,
रफ़्ता रफ़्ता राब्ता होगा उस बरसात की राख़ से मेरा।

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Poetry

तुम्हारे इर्द गिर्द

ये हवा कितनी खुशनसीब हैं
जो तुम्हारे बालों से गुज़र रही हैं
किसी जफ़्रांवाले के उँगलियों की तरह।
जिस्म के हर कण को छू रही हैं।
काश के मैं इर्द गिर्द की हवा होता,
तुमसे दूर भी ना होता,
तुम्हारी साँसों में होता।

ये ख्याल भी तुम्हारे
जो तुमसे तन्हाई का मौका मिलते ही
शायरों सी ख्याली बातें बुन रहे हैं।
रूह को हर काफ़िले से दूर कर रहे हैं।
काश के मैं तुम्हारा ख्याल होता,
तुमसे ही बातें करता,
तुम्हारा ही ख्यालों के बारे में।

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