Poetry

मासूमियत

आज वही मासूमियत से मुलाकात हुई,
अब वो रोज़ रोज़ तो नहीं मिलती,
लेकिन माज़ी को याद
कर लेता हूँ कभी कभी।

अभी कल ही की बात हैं,
मिलते ही बोली,
“कहाँ थे इतने दिन?”
“यहाँ कैसे, अच्छा ये सब छोड़ो,
और अब कहाँ?”

कितने बदल गए ये दिन ये रात,
कितने बदल गए सब, और तुम।
हाँ तुम, मासूमियत तो वही हैं,
उस बस स्टॉप से इस शाम तक।

बे-आबरू हो कर किताबों मे,
अब नहीं मिलती
वो मोटे कागजों की कहानी,
धूल मे ढकी हुई सुस्त आँखें,
इतनी मासूम तो न थी तुम।

वहीं मिलता हूँ तुम्हें मैं,
मासूम लफ्जों मे, बे-सब्र इत्तेफाकों में,
और तुम माज़ी में ही ढूँढते रहे,
“अब कुछ कहो भी,
कहाँ थे तुम इतने दिनों तक?”

Advertisements
Standard
Fictions

किताब और ऐनक

 

 

कभी दादी नानी से कोई कहानी नहीं सुनी थी रचित ने। उसे नहीं पता था रात कैसे गुजर जाती हैं उनकी गोद मे सर रखते ही।

एक रात काम से लौटते हुए गुप्ता जी एक नई गुलज़ार की किताब लेके आए। मेज पर रखी किताब और ऐनक को रचित कोने से घूरता रहा।

उस रात ना वो ऐनक आँखों से उतरी, ना वो पिता के गोद मे सोया रचित।

Standard