Poetry

गांव से शहर

साड़ी नारंगी थी उस शाम
हल्के काले रंग के बॉर्डर वाली,
चांद सूरज कानों के झुमके थे,
और तुम भी हस्ते नाचते
नंगे पांव किनारे पर
कह रही थी,
“मैं बदल रही हूं।”

देखो तो,
आज गांव से शहर हो गई हो,
दोपहर की गर्मी, काले पॉल्यूशन की,
तुम क्यों बदल गई हो।

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Poetry

कोई आने को हैं।

कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्वाब नया आने को हैं।

मुलाकातों के दिन गुजर गए,
कुछ इत्तेफ़ाक़ भिजवा दो,
कोई अफसाना नया होने को हैं।

रात हैं इंतज़ार में तरस रही,
कुछ तन्हाई मिटा दो,
कोई याद अपना आने को हैं।

जाम खाली रखे हैं,
कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्याल आने को हैं।

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Poetry

बॉसा

नशा हैं ये,
अलग और पूरा,
आंखों की पुतलियों
में जैसे सब सितारें
चमचमा जाते हो।
और वो मध्धम सा सुर,
धड़कनों को महसूस होता है।
जिस्म का हर कण
दो से एक स्वर में समा जाता है।
सांसें हम तुम की
साथ हर लह पर मचलती हो।
ऐसा होता है बॉसा,
जिससे तुम चाहते हो।

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Fictions

Kiss

“I am coming in a minute.” He went to pick call, leaving her with a pint of beer.

A few minutes later, he couldn’t find her at the table. He looked around, and found her in smoking room.

She was lighting her cigarette, when he entered. It was dull and dark room. Pint in his hand, cigarette on her lips, he grabbed her from waist. He didn’t say a word, but she heard him. His eyes talked everything. Cupped her face in his hands, her breath kissed his breath. One, two and few pack of kisses, they aligned in one breathe.

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Poetry

जनता

शोर ना करो,
अरे कोई चिल्लाओ नहीं,
शांत हो जाइए,

वो अभी सो रहे हैं,
आंखें मूंदे सपनों में,
वादों में मेरे।

एक पुल ही तो गिरा हैं,
कोई आफत नहीं आयी,
कुछ घायल,
एक–आद ही तो मरा हैं।

तस्वीरों पर ध्यान ना दो,
लिए माइक हाथ में,
सवाल पूछ लेने दो,
पर मैं जांच बिठा दूंगा।

अब तक नहीं पता चला,
कल भी नहीं पता चलेगा,
हम दो और वादे करेंगे,
वो फिर सो जाएंगे।

श्ह, चुप हो जाओ सब,
कोई शोर ना करे,
वो सब सो रहे हैं।

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Poetry

गुज़ारा

कैसे होता हैं गुज़ारा मेरे बगैर,
चाय के पहले प्याले में मिलते हैं,
ताई की एक नॉट से लिपटते हैं,
दफ़्तर की फाइलों से हट कर
डब्बे की ख़ुश्बू में महकते हैं,
शाम देर होती हैं तो,
ये नाक पर गुस्से को चूमते हैं,
किचन में सब्जियों से कटे कटे हैं,
बिस्तर की सिलवटों में जागते हैं,
पर, तुम बताओ तो,
तुम्हारा मेरे बग़ैर गुज़ारा होता कैसे हैं?

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Life, Poetry

एक रात का मीट

फिर इस रात हफ़्तों बाद मीट बना हैं,
अदरक प्याज़ का बेहतरीन तड़के से।

पर नहीं, मुझे नहीं खानी ये बोटी,
ऐसा नहीं के मुझे पसंद नहीं,
लेकिन प्लेट में जब माँ परोसती हैं,
लंबी अटकी परेशानियाँ याद आ जाती हैं।

बैग की टूटी हुई स्ट्रैप हैं,
बाज़ार में भीड़ भी बहुत हैं,
चार किलोमीटर के चार रुपए बचाये हैं,
और दफ़्तर का काम अलग हैं।

झुर्रियों में फैली ज़िन्दगी हैं,
फिक्र मंद हैं उनकी तबियत,
लेकिन आज फिर माँ ने मीट बनाया हैं,
नहीं, ये परेशानी के मसाले में बना
एक दिन का मीट मुझे पसंद नहीं।

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