Poetry

कोई आने को हैं।

कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्वाब नया आने को हैं।

मुलाकातों के दिन गुजर गए,
कुछ इत्तेफ़ाक़ भिजवा दो,
कोई अफसाना नया होने को हैं।

रात हैं इंतज़ार में तरस रही,
कुछ तन्हाई मिटा दो,
कोई याद अपना आने को हैं।

जाम खाली रखे हैं,
कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्याल आने को हैं।

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Poetry

बॉसा

नशा हैं ये,
अलग और पूरा,
आंखों की पुतलियों
में जैसे सब सितारें
चमचमा जाते हो।
और वो मध्धम सा सुर,
धड़कनों को महसूस होता है।
जिस्म का हर कण
दो से एक स्वर में समा जाता है।
सांसें हम तुम की
साथ हर लह पर मचलती हो।
ऐसा होता है बॉसा,
जिससे तुम चाहते हो।

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Poetry

गुज़ारा

कैसे होता हैं गुज़ारा मेरे बगैर,
चाय के पहले प्याले में मिलते हैं,
ताई की एक नॉट से लिपटते हैं,
दफ़्तर की फाइलों से हट कर
डब्बे की ख़ुश्बू में महकते हैं,
शाम देर होती हैं तो,
ये नाक पर गुस्से को चूमते हैं,
किचन में सब्जियों से कटे कटे हैं,
बिस्तर की सिलवटों में जागते हैं,
पर, तुम बताओ तो,
तुम्हारा मेरे बग़ैर गुज़ारा होता कैसे हैं?

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Life, Poetry

एक रात का मीट

फिर इस रात हफ़्तों बाद मीट बना हैं,
अदरक प्याज़ का बेहतरीन तड़के से।

पर नहीं, मुझे नहीं खानी ये बोटी,
ऐसा नहीं के मुझे पसंद नहीं,
लेकिन प्लेट में जब माँ परोसती हैं,
लंबी अटकी परेशानियाँ याद आ जाती हैं।

बैग की टूटी हुई स्ट्रैप हैं,
बाज़ार में भीड़ भी बहुत हैं,
चार किलोमीटर के चार रुपए बचाये हैं,
और दफ़्तर का काम अलग हैं।

झुर्रियों में फैली ज़िन्दगी हैं,
फिक्र मंद हैं उनकी तबियत,
लेकिन आज फिर माँ ने मीट बनाया हैं,
नहीं, ये परेशानी के मसाले में बना
एक दिन का मीट मुझे पसंद नहीं।

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Poetry

सुनने वाला कौन हैं यहाँ

कभी लगता हैं
तुम्हें अभी बहुत कुछ कहना हैं,
लेकिन वो सुनने वाला अब यहाँ हैं नहीं।

और अजीब हैं ये,
बातें भी उसके इर्द-गिर्द की हैं,पर
वो सुनने वाला अब यहाँ हैं नहीं।

हाँ, मैं तुम्हारे जाने के बाद,
हर्फ़-दर-हर्फ़ जज़्बात का मोहताज़ हो गया हूँ,
लेकिन तुम सुनने वाली यहाँ हो नहीं।

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इश्क़ की इबादत

इसे रहने दो वैसा ही,
जैसा सहर की पहली छाओं,
जैसे चाँद की जलती लौ।

इश्तेहार में चुटकी लेती
नए शहर की बेबसी,
कुचों में इमारतों से झाँकती
बादलों की महकती तस्वीरें।
इसे रहने दो ऐसा ही।

इश्क़ को ऐसा इबादत ही रहने दो,
मज़हब हुआ तो बिक जाएगा।

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उज़्र-ए-बारिश

वो जो बर्फ के ग्लेशियर होते हैं,
जो एक थपके में टूट गिरते हैं,

वैसा ही कुछ सिने में टूटा हैं,
कोई आग से नहीं पिघला कुछ।

चंद बची घड़ियों में वो गर्म- ठंडी आँहे हैं,
जैसे पिछले सब वहीं ठहरा हुआ हैं।

कोई छू कर भी देख ले असीर-ए-जिस्म,
दरून-ए-जिस्म मैं कांपता मिलता हूँ।

तुम्हें पता कैसे होगा इस सीली हवायों का,
सुना हैं,
अज़ीज़-ए-गुल्फ़ाम में उज़्र-ए-बारिश नहीं होती।

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