Poetry

बहुत कुछ बाकी हैं।

सुबह की मुलाकात शाम से बाकी हैं,
बहुत कुछ अब भी मुझमें बाकी हैं।

ख़्याल रखना अपना शहर की भीड़ में,
ये ख्याल रोज़ तन्हाई में बेबाकी हैं।

मिले वो इस शाम फिर वहीं राह पर,
उस को छुपे रहने में क्या आसानी हैं।

वो जो आए तो बताए तबीयत मेरी ही,
ये तबीयत उसके छुअन की हवसनाकी हैं।

उसको मालूम हैं दस्तूर–ए–गुलफाम,
कैनवास के रंगों में एक खूबसूरत दिशा बाकी है।

Advertisements
Standard
Poetry

विज्ञान का गणित

तो हुआ यूँ उस दोपहर में,
धूप उस बेदर्द की हुई, और
छाँव मेरे पाले आ गिरी।

सर्द दिसंबर का महीना रहा,
और बनिया मैं भी पक्का,
गया था हिसाब की ओर से।

पूछ लिया खाता खोल कर,
धूप छांव की बैलेंस शीट का सवाल,
वो भी मुस्कुरा दी हल्के से।

बैठा कर अपने बिछौने पर,
कैद किया अपने बॉसा में
कह कर, वो कैमिस्ट्री की ओर से है।

खाते भी क्या सँभालते,
सर्द दोपहर पसीने में भीग गए,
विज्ञान का ही सारा गणित हो गया।

Standard
Poetry

दोहराना

अब और नहीं होता ऐतबार मुझसे,
अब और नहीं तमन्ना किसी से इश्क़ की।

फिर वही खूबसूरत सुबह,
फिर वही थकी हारी शाम,
फिर किस किस को बताऊं,
फिर ये दोहराया नहीं जाता।

अब क्या क्या बताएं,
क्या क्या ना बताएं,
उन को हर चोट दिखाऊं,
उन को हर हर्फ से मिलाऊं।

फिर वो एक हिस्सा बने मेरा,
फिर वो एक हिस्सा ले जाए मेरा,
फिर एक तर्फा हो जाऊ मैं,
फिर अजनबी उनको हो जाऊ मैं।

अब और नहीं होता ऐतबार मुझसे,
अब और नहीं तमन्ना किसी से इश्क़ की।

Standard
Poetry

मरासिम

न पूछ ज़ायका मह का इस शहर में,
जहराब पीते रहे तुझे देखते देखते हम।

जाम ख़त्म हो गया लेकिन कैसे,
सहरा–ए– ज़िन्दगी में अकेले हैं हम।

फ़ुरसत से तन्हा दिखते हैं सब यहां,
ख़्यालों के सोहराब में तेरे हैं हम।

मिलती हैं बे–लौस तन्हाई मय–कदे में,
मरासिम बढ़ाए तो बढ़ाए किस्से हम।

न पूछ ज़ायका मह का इस शहर में,
शर्ब पीते रहे तुझे देखते देखते हम।

Standard
Poetry

गांव से शहर

साड़ी नारंगी थी उस शाम
हल्के काले रंग के बॉर्डर वाली,
चांद सूरज कानों के झुमके थे,
और तुम भी हस्ते नाचते
नंगे पांव किनारे पर
कह रही थी,
“मैं बदल रही हूं।”

देखो तो,
आज गांव से शहर हो गई हो,
दोपहर की गर्मी, काले पॉल्यूशन की,
तुम क्यों बदल गई हो।

Standard
Poetry

कोई आने को हैं।

कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्वाब नया आने को हैं।

मुलाकातों के दिन गुजर गए,
कुछ इत्तेफ़ाक़ भिजवा दो,
कोई अफसाना नया होने को हैं।

रात हैं इंतज़ार में तरस रही,
कुछ तन्हाई मिटा दो,
कोई याद अपना आने को हैं।

जाम खाली रखे हैं,
कुछ बातें भिजवा दो,
कोई ख़्याल आने को हैं।

Standard
Poetry

बॉसा

नशा हैं ये,
अलग और पूरा,
आंखों की पुतलियों
में जैसे सब सितारें
चमचमा जाते हो।
और वो मध्धम सा सुर,
धड़कनों को महसूस होता है।
जिस्म का हर कण
दो से एक स्वर में समा जाता है।
सांसें हम तुम की
साथ हर लह पर मचलती हो।
ऐसा होता है बॉसा,
जिससे तुम चाहते हो।

Standard