Poetry

तुम आयो तो दफ्तर कभी

दफ्तर में कभी आओ तो तुम,
एक मर्ज़ बेहिसाब मिलेगा तुम्हे|

मेज़ पर फाइलों का ढेर,
ढेरों में लिखी हुई कल की तारीख़|

लाइन में लगी उम्र होगी,
उम्रों से पुराने अटके हुए दिन|

बस इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा,
तुम आओ तो कभी दफ़्तर|

सरकारी ही हैं बस, ध्यान रखना
500 का गाँधी हो एक जेब में।
एक बाबू से बेहतर होगा पीएन|

दो कप चाय भी मिलेगी,
खर्चा तुम्हारा, चर्चा दफ्तर का।
तुम आयो तो कभी मिलने।

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2 thoughts on “तुम आयो तो दफ्तर कभी

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