Fictions

नई मुलाकात

भीड़ पर बस इतना ध्यान दिया उस दिन मैंने के हर किसी के पास वक़्त हैं कहीं जाने का। रिधिका की बाते ख़त्म हो जाती अगर मैंने शायद कुछ नहीं कहा होता। पता नहीं बस स्टैंड पर उसे सिर्फ मिलने ही आया था या फिर उसे रोकने।

“रचित, तू झूठा हैं।” अचानक से ये कह कर कदम रुकवा दिए मेरे। चोंक कर उसकी ओर देखा, और आते जाते हर मुसाफिर की तरह सभी सच झूठ का हिसाब करने लगा।

“तूने कहा था तू चुप रहता हैं, लेकिन तू तो बहुत बोलता हैं|” उसने हँस कर सारे हिसाब की उलझन खोल दी।

“ये सवाल तो मुझे भी आज दोपहर से तंग कर रहा हैं।” कहना तो चाहता था के उसकी बातों में वो खुशबू हैं जो मुझे अब ज़ुबान दे रही हैं। लेकिन फिर बातों में खो कर, बात खो गयी।

जब 11 बजे की बस चंडीगढ़ की 3:50 बजे लेने का वक़्त हुआ, तो ध्यान आया मैं रिधिका को छोड़ने आया था। शायद वो भी जाना नहीं चाहती थीं। तभी तो टिकट काउंटर पर हर बार उसने नया बहाना बनाया रुकने का। नासमझ था मैं जो इशारों की बातें ना समझा।

“तुझे नहीं लगता अब तुझे जाना चाहिए?”

“अच्छा, चल बाय।” सामान उठा कर वो चल ही पड़ी थी। “सुनो, अगली बार वक़्त निकाल कर आना।” काश के वक़्त ही ना गुज़रे, और हम दोनों वही बैठे रहते।

फ़ोन से मुलाकात तक, पहली बार का सफ़र ज़िन्दगी के उस बेहतरीन पल का होता हैं जब ज़िन्दगी तो गुज़र जाती हैं, लेकिन किताबों में पुराने फूलों की खुशबू बन कर रह जाता हैं।

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